विशेष रुप से प्रदर्शित
में प्रकाशित किया गया था #यादें, #हर्फ़_मेरे

यादों की तह से…

यादों के तह में बीते हुए लम्हों की कैद तस्वीर
 जो आज पन्नो पर व्यक्त कर रही हूँ
 बात तब की है जब मैंने किशोरावस्था में
 कदम रखा ही था, और किशोरावस्था तितली की तरह चंचल होता है।
 मन मे अनेक कल्पनाओं को उड़ान लिए हुए दुनियाँ के झमेलों से दूर आँखे रंगीन सपने बुनती हैं।
 और सपने इतने चंचल की सेमल के ताजी फूटी हुई रुई की तरह जरा सा मे उड़ जाने को तैयार
 उम्र के तमाम नादानियां अल्हड़पन इसी उम्र से तो होकर गुजरते है। मन मे ढ़ेर सारे दिव्यस्वपन हकीकत की दुनियाँ  से अनजान होते है।
 इन सपनो से अछूती मैं भी नही रह सकी।
 चलिए बहुत हो गई किशोरावस्था की बातें
 अब मुख्य बिंदु पर चलती हूँ।

 

आज भी याद है बर्थ नम्बर 69 और वो अज़नबी।
 मैं अपने पूरे परिवार के साथ तीर्थयात्रा पर जा रही थी। रिजर्वेशन स्लीपर क्लास में ही था।
 ट्रेन मे चढ़ने के बाद थोड़ी देर मे हम अपनी- अपनी सीट पर व्यवस्थित हो गए।
 मुझे बचपन से प्रकृति से बहुत प्रेम है ऊचे पेड़ नदियां तलाब झरने खेत हरियाली मुझे बहुत लुभाते है। और ट्रेन मैं बैठ कर खिड़की से इन नज़ारो को निहारना आज भी मेरी आदत है
 आदतन मैं खिड़की के तरफ देखने लगी। सहसा किसी की धीमे से खाँसने से  मेरी तन्द्रा टूटी।
 मैंने देखा सामने एक नवयुवक इस तरह खाँसने का ढोंग कर रहा था मानो किसी का ध्यान आकृष्ट करना चाह रहा हो, झट मैंने वापिस मुँह फेर लिया। पर सीट कुछ आमने-सामने थी और मुझे भी शरारत सूझ रही थी एक दो बार मैं भी उसे देख ही लेती थी।
 ना जाने क्या देखता वो घूर-घूरकर और नज़रें झुका लेता।
 मेरा मन हुआ एक बार उससे उसकी हरकत  की वजह पूछू, झिझक परिवार का डर और कुछ मेरे माता-पिता द्वारा दी हुई संस्कार और नैतिकता ने मुझे ऐसा करने नही दिया।
 कुछ तो कहना चाह रहा था वो मगर मैंने अनसुनी कर दी...
 जानते हुए भी लापरवाह  बनी रही उसकी भावनाओं से..
 मुझे लगा होगा कोई आवारा सड़कछाप।
 मैं उसके कौतूहल को नही समझ सकी।
 मै अपने आप में मगन  और ट्रेन अपने रफ़्तार में मगन।
 बहुत दूर तक सफ़र में वो मेरे साथ रहा  और आँखों मे एक याचना लिए मुझे देखता रहा।
 हमे देवी माँ के मन्दिर जाना था और उसे भी शायद।
 मन्दिर के कतार में वो भी खड़ा था  मैं बीच -बीच मे नज़रें बचा कर मैं उसकी हरकतों पर नज़र रखी हुई थी।
 और उसकी बेबस नज़रे बार -बार मुझे  ही घूर रही थी जब मैं उसपर जलती हुई निगाह  डालती वो हड़बड़ा कर नज़र
 झुका लेता....जैसे उसकी कोई चोरी पकड़ ली गई हो।
 यात्रा की वापसी पर भी वो बस मे हमारे साथ था। ये उसकी सोची समझी योजना थी या महज  एक संयोग था।
 मैं हतप्रभ रह गई बस मे उसको देखकर
 अब तो बहुत  खीझ होने लगी थी उसपर  कब चला जाये वहां से और मैं संयत हो सकूँ।
 ईश्वर से प्रार्थना करने लगी।
 करू भी क्यों नही उसने मेरा खाना पीना दूभर कर रखा था 
 लज्जा वश कुछ खा भी नही पा रही थी। भूख से बुरा हाल था। पर उसकी टकटकी की वजह  से अपनी जगह मूर्ति बन बैठी रही।
 रास्ते में बहुत तरह की चीज़े देखकर  मन तो ललचाता मगर क्या करती।
 एक शब्द बोलने को जुबान खोलती तो  शांतचित से मेरी बात सुनने लगता।
 पांच घण्टे का सफ़र युग सा प्रतीत होने लगा.......,
 आखिर यात्रा की समाप्ति हुई  हम बस से उतर कर स्टेशन पर आ गए  और हमारे पीछे वो भी।
 लगातार यात्रा करने से  मैं थक चुकी थी वही एक बेंच पर लेट गई
 वो भी आसपास बैठ गया जहा से मुझे देख सके।
 कब मेरी आँख लग गई पता नही ।
 रात को 12 बजे उठी फिर उस तरफ नज़र दौड़ाई जहा वो बैठा था।
 पर वो जगह तो खाली थी जैसे मेरा मुँह चिढ़ा रही हो।
 मैंने नज़रे दौड़ाई मगर वो नही मिला।
 मैं एक बार खुश हुई चलो फुर्सत मिली। 
 फिर सहसा मन मे कुछ टूट सा गया  उसका ना होना चुभ सा गया। मन भारी सा होने लगा ।
 शायद मैंने अब उस अज़नबी की मौन मनुहार को पढ़ लिया था।
 कुछ पल के लिए ही मेरे भी एहसास जाग चुके।
 मगर अब देर हो चुकी थी।
 बस वो एक याद बनके रह गया।
 जो सफ़र मे मिला वो सफ़र मे छूट गया.....
 मैंने बस एक लम्बा साँसभर  लिया  थोड़ा मुस्कुराई।
 दिल से निकला तुम जो भी हो ,जैसे हो ,जहाँ रहना, जिसके रहना 
 सदा खुश रहो।

#हर्फ़_मेरे

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में प्रकाशित किया गया था #कविता, #मोती_मोती_शब्द

प्रेम का साक्षात्कार

मन के भीतर का अधूरापन.. 

कड़ी संघर्ष करता है तुम्हारे नही होने का;

आत्मा से लेकर परमात्मा तक कि यात्रा में तुम मेरे साथ होते हों..

क्या कम है? किसी आत्मिय से पवित्र आत्मिक सम्बंध का होना;

सभी विरोधाभास से मुक्त..

विचारों में हिलोरे लेना..

आत्मा की छत्रछाया में..

हृदय सतह पर बरगद सा उग जाना;

 

यह निर्मलता साधारण नही है..

निःस्वर्थता का सोम स्वाद है;

चखा है जिसने अमरता का यह स्वाद…

सही मायने में उसने प्रेम का साक्षात्कार किया है….!!

 

 

 

 

में प्रकाशित किया गया था #कविता

पूर्ण समर्पण

जीवन के “भग्नाशेष” पर..

झुके हुए सम्बन्धो की “रीढ़” पर..

तुम्हारे प्रेम की सत्यता का,

“आकाशदीप” जलना!

हिमालय से आती बर्फीली हवाओं की शोर से..

कम्पित “लौ” झुकना,जूझना,लड़ना निरन्तर..

निरुद्वेग निर्विकार जलना!

तूफ़ानी हवा के बहाव से..

अधीर होकर मिटना..

हो लज्जित मेरा दीये के इस बलिदान को देखना!

क्षत-विक्षत हताशा से तुम्हे झझकोरना..

“प्रेम के बलिदान” पर कौन मरा कौन जिया..

“पूर्ण समर्पण” का क्या विषाद रखना!

भर भुजाओं में तूफ़ान का वेग, तुम्हारा उठना..

कर आशा का दीप प्रज्वल्लित..

काल के पन्नो पर तुम्हारा लिखना!

बाक़ी है मुझमे अभी स्निग्ध ताप..

भर दूँगा तेरे पथ पर प्रकाश!

तेरे द्वार पर “दीपक” बन जलूँगा..

तेरे आँगन में “भोर” का उजास…!!

में प्रकाशित किया गया था #कविता

गुलाबी यादें

मेरे कमरे की खिड़की से दिख रही…

उस दूर वाली दीवार पर,

एक ढ़लती शाम..

एक छोटे से धूप के कतरे में..

सुख रहे गुलाबी पर्दे पर,

सहमी सी परछाई में..

“प्रेम-दर्द का अपरिमेय अनुबंध”

स्निग्ध धूप के आख़िरी कोर पर…

कुछ आँसू के कतरन पकड़े,

यादों की स्याही में डूब रहे मन से..

उदासियों के बादल पर,

लिखा मैंने बीते दिनों के..  

ग़ुलाबी लम्हों के,

कुछ ऊँघते क़िस्से….

और बस बोझिल मन से,

अधखुली खिड़की पर..

सरका दिया मैंने, 

तुम्हारी यादों पर गुलाबी पर्दा…!!

में प्रकाशित किया गया था #हर्फ़_मेरे

हृदय की भाषा 

अपनी जवानी के अठ्ठारह सालों को अपने दुप्पटे के खूंटे से बाँधे धधकता यौवन लेकर…

लाई थी वो अपने साथ सन्तरंगी उम्मीदों का उफ़ान लिए प्रेम का समंदर…वो सभी पर्याप्त साधन लाई थी प्रेम के सरोवर में डूबा कर..और ख़ुद महुआ का रस पीकर आई थी…उन्मदित्त हो स्वयं को प्रेम में समर्पित करने को…

वो मदिरा से नहा कर आई थी…मदहोश होने को…उसने पारिजात भरे थे मुट्ठी भर…प्रेम को दुर्लभ बनाना चाहती थी…वो आई धीरे से किवाड़ खोला… अपने मन का 

उसने लड़के को पुकारा…मन से..उसने मौन होकर लड़के से कहाँ… प्रेम करती हूँ तुमसे..लड़का कुछ न सुन सका….लडक़ी न जाने कितनी बार कहती रही लड़के से करोगे मुझसे प्रेम….लड़का शून्य को निहारता रहा…लड़की ने प्रेम का पारिजात रोपना चाहा लड़के के हृदय पर…लड़का घबरा कर दूर छिटक गया…पारिजात के नन्हे-नन्हें भूल धरती के आँचल में बिछ गये…उन फूलो में शामिल था लड़की का विशिष्ट अलौकिक मौन प्रेम..
लड़के ने लापरवाही से देखा और पीछे मुड़ गया

लड़की लौट आई…मुठ्ठी भर मासूम उम्मीद लिए

लड़की के मन में एक प्रश्न कौतुहल कर रहा था…प्रेम हृदय की भाषा नही पढ़ सकता??

क्या जरूरी है प्रेम में  विलज्ज  हो जाना??

में प्रकाशित किया गया था #अल्फ़ाज़_मेरे

प्लेटोनिक लव

सुनो…..

क्या…बोलो

हूँ..

दिल करता है ना…

क्या…

अपने दिल की एक-एक धड़कन तुम्हे सूना दूँ..

अच्छा…

और??

और..तुम अपना नाम गिनो..मेरी धड़कनो पे…

मेरी साँसे तुम्हारे नाम के प्रत्येक अक्षर पर.. गहरी साँस लेती है

ओह…क्यूँ..

नादान…समझो ना..

समझा दो..

इस तरह लम्बी-लम्बी साँसों के साथ तुम्हे धड़कनों के भीतर उतार रही होती हूँ…और गहरा..और गहरा… और गहरा…

की तुम मेरे साँसो में घुल जाओ…

और…..?

और की…..तुम मेरे जान बन जाओ…..

ओह्ह……..!

तुम मुझे इसतरह प्रेम करती हो?

हूँ……..

मैं तुम्हारी किस्मत नही हूँ….

तुम मेरी लकीरों में नही हो…

जानती हूँ…

फिर ???

फिर क्या….प्रेम किया है

सच्चे मन से…

मन का एक तार सदा जुड़ा रहेगा हमारा तुम्हारा…

मैं तुम्हे याद आऊँगी….

जब भी कोई बाहार का मौसम तुमसे होके गुजरेगा

तुम मुझे सदा साथ पाओगे जबभी दुःख एक तिनका पास तुम्हारे फटकेगा…

और…??

और…..यही तो हे प्लेटोनिक लव……

है ना….?

बोलो…बोलो ना…..!

में प्रकाशित किया गया था #मोती_मोती_शब्द

पंचम स्वर 

​तुम्हारी साधना सहज नही थी

संगीत का सप्तक अनुशासित ताल

सात स्वरों में तुम्हारी इबारत।

सहज नही था इसे साधना 

सुरों को वाकिफ़ कराया तुम्हारे……

भोलेपन,मासूमियत, तुनकमिज़ाजी,कठोरता,

 भावुकता, बचपना से……

कोशिश की तुम्हे संगीत के सात स्वरों में साधने की।

पर “पंचम स्वर” तो तुम में था हीं नही।

 हाँ पंचम स्वर……

पंचम स्वर के बिना तो संगीत की साधना निष्फल है।

“पंचम स्वर” यानी कोयल के स्वर की मिठास

  “मिश्री सा माधुर्य”……

और माधुर्य के बिना संगीत का सामीप्य कैसे…?

  “सम्बन्ध” का स्थायित्व कैसे जीवन का सार कैसे….?
 

में प्रकाशित किया गया था #मोती_मोती_शब्द

प्रेम कविता

देखो हज़ारो रातरानी धरती के आँचल पर बिछ रहे है पूरे वातावरण में दिव्य सौरभ,

आसमान पर अलौकिक दिव्य आभा,

वो उस तारे में कुछ ख़ास  चमक है…

वो तुम्हारी ओर इंगित होके खुशी जाहिर कर रहा है।

पूरे वातवरण में बस तुम गूँज रहे हो..

मैं तुम्हे गूँजता हुआ हीं तो देखना चाहती हूँ।

तुम्हारा विस्तृत सम्राज्य तुम; तुम्हारी प्यारी सी दुनियाँ…

और हाँ वही कोने में मेरा भी अस्तित्व मौजूद होगा अनुभव करना…

हो सके तो मुझे अंधेरो से उठा कर भोर के उजाले पर टाँक देना…

मैं आलोकित करूँगी तुम्हारे पथ को…

तुम जब गुजरोगे यहाँ से,

तुम्हारी अनुगामिनी बन।

वही रस्तों पर पहाड़ों पर,

 झरनों की कल-कल, 

बागों के झूलों पर,

गुलशन की फूलों पर,

गंगा की तट पर,

नौका की हलचल में,

समंदर की लहरों में,

रेत के टीलों पर,

खेतो की मेड़ पर,

लहलहाते फसलों पर,

तितलियों के रंगों पर,

भोर की लाली पर,

सूरज के उगने पर,

किरणों के खिलने पर,

साँझ की छाँव पर,

गोधूलि के गालों पर,

अँधेरा पसरने पर,

चाँद निकलने पर,

तारों के टीम-टीम पर,

जुगनुओं के झिलमिल पर,

जहां तक नजर जाएं,

नजारे जो नजर आए….दूर-दूर वहाँ तक…

तब-तब करना,

मुझे महसूस करना….

तुम्हारे इर्द-गिर्द

मैं वही बैठ रचूँगी….

तुम्हारे लिए दुनियाँ की सबसे खूबसूरत प्रेम कविता

हाँ प्रेम कविता…….!!